Cirrhosis of the Liver: Stages, Treatment and Recovery Tips In Hindi : सिरोसिस एक धीरे-धीरे बढ़ने वाली गंभीर यकृत रोग है, जिसमें स्वस्थ यकृत ऊतक की जगह निशान ऊतक ले लेता है। यह बदलाव यकृत की सामान्य संरचना और कार्यप्रणाली को बाधित करता है। जब निशान ऊतक बढ़ता है, तो वह यकृत में रक्त प्रवाह को अवरुद्ध कर देता है और परिणामस्वरूप पोषक तत्वों, हार्मोन, दवाओं तथा शरीर द्वारा स्वाभाविक रूप से निर्मित विषाक्त पदार्थों के प्रसंस्करण की क्षमता धीमी हो जाती है।
इसके साथ ही यकृत द्वारा आवश्यक प्रोटीन और अन्य महत्वपूर्ण पदार्थों का निर्माण भी प्रभावित होता है। लंबे समय तक सिरोसिस बढ़ने पर यह लिवर फेलियर, पोर्टल हाइपरटेंशन, एसाइटिस, पीलिया और यहां तक कि लिवर कैंसर जैसी गंभीर जटिलताओं का कारण बन सकता है।

क्या है लिवर सिरोसिस ?
लिवर एक अत्यंत मजबूत अंग है, जो सामान्य परिस्थितियों में अपनी क्षतिग्रस्त कोशिकाओं को दोबारा बना लेता है, लेकिन जब लंबे समय तक अत्यधिक शराब का सेवन किया जाता है या क्रोनिक संक्रमण मौजूद रहता है, तो धीरे-धीरे सिरोसिस विकसित हो सकता है। इस स्थिति में लिवर सिकुड़कर कठोर हो जाता है और उसकी संरचना बदल जाती है। परिणामस्वरूपपोर्टल शिरा, जो पाचन तंत्र से पोषक तत्वों से भरपूर रक्त को लिवर तक पहुँचाती है, वह अवरुद्ध होने लगती है।
जब रक्त लिवर से होकर नहीं गुजर पाता, तो पोर्टल शिरा में दबाव बढ़ जाता है और इसे पोर्टल हाइपरटेंशन कहते हैं। यह उच्च दबाव धीरे-धीरे एसोफैगल वैरिकाज़ यानी अन्ननली में फैली हुई नाज़ुक नसों का कारण बनता है। ये नसें बहुत पतली और संवेदनशील होती हैं, जो अचानक फट सकती हैं। यदि ऐसा होता है, तो गंभीर आंतरिक रक्तस्राव शुरू हो जाता है, जो समय पर इलाज न मिलने पर जीवन के लिए घातक साबित हो सकता है।
लिवर सिरोसिस के लक्षण
लिवर सिरोसिस के शुरुआती चरण में अक्सर कोई स्पष्ट लक्षण नहीं दिखते, लेकिन जैसे-जैसे रोग बढ़ता है, कई तरह के संकेत सामने आते हैं। इन्हें दो श्रेणियों में बाँटा जा सकता है।
प्रारंभिक लक्षण
- लगातार थकान और अस्पष्टीकृत कमजोरी महसूस होना।
- त्वचा और आँखों का पीला पड़ना।
- रक्त में पित्त लवण जमा होने से त्वचा में खुजली।
- ऊपरी दाहिने पेट में दर्द या भारीपन।
- भूख न लगना और वज़न का कम होना।
- पैरों, टखनों और पेट में तरल पदार्थ का जमाव होना, जिससे सूजन पैदा होना।
उन्नत लक्षण
- आसानी से चोट लगना और रक्तस्राव। इसका कारण है, कि लिवर पर्याप्त थक्का बनाने वाले प्रोटीन का उत्पादन नहीं कर पाता।
- त्वचा पर विशेषकर ऊपरी शरीर पर मकड़ी जैसी लाल रक्त वाहिकाएं दिखाई देना।
- मूत्र का रंग गहरा तथा मल का रंग पीला या मिट्टी जैसा होना।
- हेपेटिक एन्सेफैलोपैथी की स्थिति में भ्रम, याददाश्त की समस्या और व्यक्तित्व में बदलाव भी हो सकता है।
- पुरुषों में हार्मोन असंतुलन के कारण स्तनों का बढ़ना।
लिवर सिरोसिस के कारण
लिवर सिरोसिस एक ऐसी स्थिति है, जिसमें लिवर की कोशिकाएँ बार-बार क्षतिग्रस्त होती हैं और उनकी जगह निशान ऊतक ले लेता है। यह प्रक्रिया धीरे-धीरे लिवर की संरचना और कार्यप्रणाली को स्थायी रूप से प्रभावित कर देती है। सिरोसिस का सबसे चिंताजनक पहलू यह है, कि यह अक्सर अपरिवर्तनीय होता है, यानी एक बार लिवर में बने निशान सामान्य नहीं हो पाते। यह स्थिति न केवल लिवर की कार्यक्षमता को कमजोर करती है, बल्कि शरीर के अन्य अंगों और प्रणालियों पर भी गंभीर प्रभाव डाल सकती है।
- शराब का लगातार सेवन – लंबे समय तक और अत्यधिक शराब पीना लिवर कोशिकाओं को क्षति पहुँचाता है, जिससे सूजन और फाइब्रोसिस होता है।
- स्वप्रतिरक्षी यकृत रोग – स्वप्रतिरक्षी हेपेटाइटिस, प्राथमिक पित्तवाहिनीशोथ (PBC) और प्राथमिक स्केलेरोज़िंग पित्तवाहिनीशोथ (PSC) में शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से लिवर पर हमला करती है।
- दीर्घकालिक दवा उपयोग – मेथोट्रेक्सेट, आइसोनियाज़िड और कुछ एंटीरेट्रोवाइरल दवाएँ, जिनका लंबे समय तक उपयोग लिवर को नुकसान पहुँचा सकता है।
- अज्ञात कारण से सिरोसिस – कुछ मामलों में सिरोसिस का सटीक कारण अज्ञात रह जाता है, जिसे क्रिप्टोजेनिक सिरोसिस कहा जाता है।
वायरल हेपेटाइटिस – क्रोनिक हेपेटाइटिस B और हेपेटाइटिस C संक्रमण लिवर में लगातार सूजन और फाइब्रोसिस का कारण बनते हैं। - नॉन-अल्कोहॉलिक फैटी लिवर डिज़ीज़ (NAFLD/NASH) – मोटापा, डायबिटीज़ और इंसुलिन रेसिस्टेंस से जुड़ा फैटी लिवर धीरे-धीरे नॉन-अल्कोहॉलिक स्टीटोहेपेटाइटिस (NASH) में बदल सकता है और आगे चलकर सिरोसिस का कारण बनता है।
- पित्त सिरोसिस – प्राथमिक पित्त सिरोसिस (Primary Biliary Cirrhosis – PBC): इसमें प्रतिरक्षा प्रणाली छोटी पित्त नलिकाओं पर हमला करती है, जिससे पित्त का बहाव रुक जाता है और लिवर को क्षति होती है।
- सिस्टिक फाइब्रोसिस – यह एक आनुवंशिक विकार है, जिसमें पित्त गाढ़ा और चिपचिपा हो जाता है। इससे पित्त नलिकाओं में रुकावट पैदा होती है और लिवर को धीरे-धीरे नुकसान पहुँचता है, जो सिरोसिस में बदल सकता है।

लिवर सिरोसिस के चरण
लिवर सिरोसिस एक प्रगतिशील स्थिति है जिसमें लिवर के भीतर निशान ऊतक विकसित होते हैं और समय के साथ इसकी कार्यक्षमता धीरे-धीरे समाप्त हो जाती है। इस रोग की गंभीरता का आकलन करने के लिए चिकित्सक अक्सर दो प्रमुख स्कोरिंग प्रणालियों का उपयोग करते हैं। पहला चाइल्ड-प्यूग वर्गीकरण और दूसरा मॉडल फॉर एंड-स्टेज लिवर डिजीज स्कोर।
ये दोनों ही प्रणालियाँ विभिन्न नैदानिक और प्रयोगशाला मानकों पर आधारित होती हैं, जो सिरोसिस की अवस्था और रोगी की स्थिति का स्पष्ट आकलन करने में मदद करती हैं। इन चरणों की समझ न केवल रोगियों के लिए, बल्कि स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यही जानकारी उपचार संबंधी निर्णयों और प्रबंधन की रणनीतियों को दिशा प्रदान करती है।
प्रतिपूरित सिरोसिस
प्रतिपूरित सिरोसिस वह अवस्था है, जब लिवर को नुकसान तो पहुंच चुका होता है, लेकिन फिर भी यह अपने अधिकांश महत्वपूर्ण कार्यों को सही तरीके से करने में सक्षम रहता है। इस शुरुआती चरण में अक्सर रोगियों को कोई स्पष्ट लक्षण अनुभव नहीं होते या फिर लक्षण बहुत हल्के हो सकते हैं, जैसे लगातार थकान महसूस होना या पेट में हल्की असुविधा होना। इस स्थिति को चाइल्ड-प्यूग क्लास ए में वर्गीकृत किया जाता है, जो अपेक्षाकृत हल्के लक्षणों और बेहतर लीवर कार्यक्षमता को दर्शाता है।
विघटित सिरोसिस
विघटित सिरोसिस वह अवस्था है, जब सिरोसिस बढ़ने के साथ लिवर की कार्यक्षमता गंभीर रूप से प्रभावित होने लगती है और मरीज में अधिक गंभीर लक्षण तथा जटिलताएँ प्रकट होती हैं। इसे चाइल्ड-प्यूग क्लास बी और क्लास सी में विभाजित किया गया है। चाइल्ड-प्यूग क्लास बी मध्यम स्तर के यकृत विकार को दर्शाता है, जिसमें जटिलताओं का खतरा अधिक होता है। इस चरण में मरीज को पेट में तरल पदार्थ का जमाव, पीलिया और आसानी से रक्तस्राव या चोट लगने जैसी समस्याएँ हो सकती हैं।
चाइल्ड प्यूग क्लास सी
चाइल्ड-प्यूग क्लास सी सिरोसिस का सबसे गंभीर चरण है, जिसमें लिवर की कार्यक्षमता लगभग समाप्त हो जाती है और जटिलताओं का खतरा अत्यधिक बढ़ जाता है। इस स्थिति में मरीज गंभीर जलोदर, हेपेटिक एन्सेफैलोपैथी जैसे, मानसिक भ्रम और व्यवहार में परिवर्तन तथा बार-बार रक्तस्राव जैसी समस्याओं से जूझते हैं।
एंड स्टेज लिविर डिजीज
अंतिम चरण यकृत रोग एंड स्टेज लिविर डिजीज (ESLD) सिरोसिस की सबसे उन्नत अवस्था है, जिसमें जीवन के लिए खतरा पैदा करने वाली गंभीर जटिलताएँ सामने आती हैं। इस चरण में मरीज गंभीर लक्षणों से पीड़ित होते हैं, जैसे हेपेटिक एन्सेफैलोपैथी, बड़े पैमाने पर जलोदर यानि पेट में अत्यधिक तरल का जमाव, हेपेटोरेनल सिंड्रोम यानि लिवर की शिथिलता से संबंधित गुर्दों का फेल होना और वैरिकाज़ रक्तस्राव यानि ग्रासनली या पेट की रक्त वाहिकाओं से खतरनाक रक्तस्राव। ई.एस.एल.डी न केवल रोगी के जीवन की गुणवत्ता को गंभीर रूप से प्रभावित करता है, बल्कि जीवन-रक्षा के लिए अक्सर लिवर प्रत्यारोपण (Liver Transplantation) ही एकमात्र विकल्प बन जाता है।
लिवर सिरोसिस का उपचार
लिवर सिरोसिस के उपचार के लिए कुछ खास तरीकों का वर्णन इस प्रकार है।
दवाओं का सेवन
ये उपचार विधियाँ कुछ यकृत संबंधी बीमारियों के प्रबंधन या इलाज में प्रभावी हो सकती हैं, हालांकि इनकी सफलता दर बीमारी के प्रकार और उसकी गंभीरता पर निर्भर करती है। उदाहरण के लिए, एंटीवायरल दवाएँ हेपेटाइटिस सी का पूरी तरह इलाज करने में सक्षम हैं, जबकि हेपेटाइटिस बी के मामले में वे केवल वायरस को दबा सकती हैं, इसे पूरी तरह खत्म नहीं कर सकतीं। इसी तरह कॉर्टिकोस्टेरॉइड्स और इम्यूनोसप्रेसेंट्स कुछ स्वप्रतिरक्षी यकृत रोगों, जिन्हें ऑटोइम्यून डिजीज के नाम से जाना जाता है, के उपचार में लाभकारी साबित होते हैं, लेकिन ये सभी मरीजों में समान रूप से प्रभावी नहीं होते।
टीकाकरण
सिरोसिस से पीड़ित व्यक्तियों को अतिरिक्त यकृत क्षति से बचाने के लिए टीकाकरण बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसे मरीजों को हेपेटाइटिस A और हेपेटाइटिस B के विरुद्ध टीके अवश्य लगवाने चाहिए, ताकि संक्रमण के कारण होने वाली जटिलताओं से बचाव किया जा सके। डॉक्टर की सलाह के अनुसार अन्य आवश्यक टीके भी लिए जा सकते हैं।
लिवर प्रत्यारोपण
गंभीर यकृत क्षति या अंतिम चरण के यकृत रोग (ESLD) के मामलों में, लिवर प्रत्यारोपण ही एकमात्र प्रभावी उपचार विकल्प माना जाता है। उपयुक्त मरीजों को विशेषज्ञों की सलाह के बाद प्रत्यारोपण के लिए योग्य घोषित किया जाता है और उन्हें प्रतीक्षा सूची में शामिल किया जाता है।
नियमित चिकित्सा निगरानी
लिवर सिरोसिस के मरीजों के लिए लिवर की कार्यक्षमता की जाँच, संभावित जटिलताओं का आकलन और समय-समय पर उपचार में आवश्यक बदलाव करने के लिए नियमित रुप से उसका पालन करना बहुत ज़रूरी है। ऐसे मरीजों को किसी अनुभवी और विशेषज्ञ लिवर रोग विशेषज्ञ (हेपाटोलॉजिस्ट) से समय-समय पर परामर्श लेना चाहिए।
स्वस्थ जीवनशैली
स्वस्थ जीवनशैली बनाए रखना बेहद महत्वपूर्ण है, खासकर उन लोगों के लिए जो नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज (NAFLD) या नॉन-अल्कोहलिक स्टीटोहेपेटाइटिस (NASH) से जूझ रहे हैं। इसके लिए संतुलित आहार लेना, नियमित रूप से व्यायाम करना और वज़न को नियंत्रित रखना ज़रूरी है।
नियमित जाँच
सिरोसिस की प्रगति पर नज़र रखने और संभावित जटिलताओं का समय रहते पता लगाने के लिए नियमित जाँचें बेहद ज़रूरी हैं। डॉक्टर की सलाह के अनुसार किए जाने वाले परीक्षणों में शामिल हो सकते हैं।
लिवर फ़ंक्शन टेस्ट (LFT) लीवर की कार्यक्षमता की जाँच के लिए।
अल्ट्रासाउंड निशान (स्कैरिंग) और संभावित ट्यूमर की निगरानी के लिए।
एंडोस्कोपी अन्नप्रणाली (इसोफेगस) में वैरिकाज़ नसों की जाँच के लिए।
शराब से दूरी
जब तक शराब का सेवन जारी रहता है, लिवर की स्थिति और बिगड़ती जाती है। इस प्रक्रिया को सफलतापूर्वक अपनाने के लिए कई लोगों को मादक द्रव्यों के सेवन संबंधी विकार के लिए विशेष उपचार की आवश्यकता होती है। इसमें परामर्श, व्यवहार-चिकित्सा, सहायता समूह और कभी-कभी औषधीय उपचार भी शामिल हो सकते हैं। सही मार्गदर्शन और सहयोग से, शराब छोड़ने से लिवर की स्थिति को स्थिर किया जा सकता है और जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाया जा सकता है।

लिवर सिरोसिस से बचने के तरीके
- आहार अनुपूरक शामिल करें – अगर आपके शरीर में किसी विशेष विटामिन या खनिज की कमी है, तो डॉक्टर की सलाह के अनुसार आहार अनुपूरक लेना ज़रूरी हो सकता है। ये पोषण संबंधी कमियों को पूरा करने में मदद करते हैं और शरीर को स्वस्थ बनाए रखते हैं।
- संक्रमण से बचें – सिरोसिस से पीड़ित लोगों की प्रतिरक्षा प्रणाली कमज़ोर हो सकती है, जिससे संक्रमण का ख़तरा बढ़ जाता है। ऐसे में कच्ची या अधपकी मछली, शंख और मांस का सेवन न करें, क्योंकि इनमें मौजूद बैक्टीरिया या वायरस गंभीर संक्रमण का कारण बन सकते हैं। खाने को हमेशा अच्छी तरह पकाकर ही खाएँ और स्वच्छता का विशेष ध्यान रखें।
- शारीरिक रूप से सक्रिय रहें – नियमित व्यायाम करने से शरीर का संतुलन, सहनशक्ति और मांसपेशियों की ताकत बेहतर होती है। हालांकि, व्यायाम हमेशा धीरे-धीरे शुरू करें और अपनी स्थिति के अनुसार सुरक्षित विकल्प चुनने के लिए डॉक्टर से परामर्श अवश्य लें।
- सोडियम कम करें – सिरोसिस के मरीजों में जलोदर (पेट में तरल पदार्थ का जमाव) को रोकने और नियंत्रित करने के लिए सोडियम का सेवन सीमित करना ज़रूरी है। खाने में कम नमक डालें और पैक्ड/प्रोसेस्ड फूड से बचें। स्वाद बढ़ाने के लिए नमक की जगह ताज़ी जड़ी-बूटियों और मसालों का उपयोग करें।
- विषाक्त पदार्थों से बचें – सिरोसिस या अन्य यकृत रोगों से पीड़ित लोगों को ऐसे रसायनों से दूर रहना चाहिए जो लिवर पर अतिरिक्त दबाव डाल सकते हैं। सफाई उत्पादों, कीटनाशकों, पेंट या औद्योगिक धुएं के सीधे संपर्क से बचें। यदि इनका उपयोग ज़रूरी हो, तो हमेशा दस्ताने, मास्क और उचित वेंटिलेशन का उपयोग करें।
- नशीले पदार्थों का सेवन छोङ दें – भले ही आपकी लिवर की बीमारी सीधे तौर पर शराब या नशीले पदार्थों से संबंधित न हो, फिर भी इनसे परहेज़ करना आपके लिवर के स्वास्थ्य के लिए बेहद फायदेमंद है। शराब और नशीले पदार्थ लिवर पर अतिरिक्त दबाव डालते हैं और समय के साथ लिवर की कार्यक्षमता को और कमजोर कर सकते हैं।