The Gut-Liver Connection: How Digestion Affects Your Liver In Hindi : आंत यकृत अक्ष जिसे आम भाषा में गट लिवर एक्सिस के नाम से जाना जाता है। हमारे शरीर की एक बेहद दिलचस्प और जरूरी प्रणाली है। इसे आप आंत और लिवर के बीच चलने वाला दोतरफा संवाद समझ सकते हैं। जब आंतों का माइक्रोबायोम स्वस्थ होता है, तो लिवर को सपोर्ट मिलता है और सूजन कम होती है। वहीं अगर आंतों में हानिकारक बैक्टीरिया बढ़ जाएं या लीकी गट जैसी समस्या हो, तो वही हानिकारक पदार्थ लिवर तक पहुँचकर उसे नुकसान पहुँचा सकते हैं। यही वजह है, कि आंत और लिवर दोनों का स्वास्थ्य एक-दूसरे से गहराई से जुड़ हआ है। अगर आप चाहते हैं, कि आपका लिवर लंबे समय तक स्वस्थ रहे तो आंतों की देखभाल करना उतना ही जरूरी है।

क्या है आंत यकृत संबंध ?
आंत और लिवर का रिश्ता बेहद गहरा होता है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में आंत-यकृत अक्ष (gut-liver axis) कहा जाता है। ये दोनों अंग एक तरह से लगातार आपस में बातचीत करते रहते हैं। जब आंतों का स्वास्थ्य बिगड़ता है, तो उसका सीधा असर लिवर पर पड़ता है और अगर लिवर में कोई गड़बड़ी हो जाए तो वह भी आंतों के माइक्रोबायोम को खराब कर सकता है। अगर किसी को लीकी गट जैसी समस्या हो यानी आंतों की दीवार कमजोर हो जाए और हानिकारक बैक्टीरिया या टॉक्सिन्स खून में जाने लगें, तो लिवर को उन्हें साफ करने के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है। धीरे-धीरे यह लिवर की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचा सकता है और फैटी लिवर या सिरोसिस जैसी बीमारियों की शुरुआत हो सकती है।
वहीं दूसरी ओर अगर लिवर बीमार हो जैसे हेपेटाइटिस, सिरोसिस या कोई और इंफ्लेमेशन की स्थिति हो, तो वह आंत के माइक्रोबायोम का संतुलन बिगाड़ देता है। इससे पाचन कमजोर हो जाता है और उसके परिणामस्वरुप पेट फूलना, कब्ज और सूजन जैसी समस्याएं बढ़ जाती हैं। यही वजह है, कि आजकल डॉक्टर आंत यकृत अक्ष पर बहुत रिसर्च कर रहे हैं। ऐसे में आंत और लिवर के एक-दूसरे को प्रभावित करने के कारणों को समझना और भी जरुरी हो जाता है।
पाचन क्रिया में लिवर की भूमिका
हमारे शरीर में जब भोजन का पाचन होता है, तो उसमें लिवर की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जानते हैं इसकी खास भूमिका के बारे में।
रक्त शर्करा का नियंत्रण
जब हम खाना खाते हैं, तो कार्बोहाइड्रेट्स से ग्लूकोज़ बनता है और वह खून में पहुंच जाता है। लिवर इस ग्लूकोज़ को तुरंत इस्तेमाल करने की बजाय उसका कुछ हिस्सा ग्लाइकोजन के रूप में स्टोर कर लेता है। जब शरीर को एनर्जी की जरूरत होती है या जब हम लंबे समय तक कुछ नहीं खाते, तो यही लिवर उस स्टोर किए गए ग्लाइकोजन को दोबारा ग्लूकोज़ में बदलकर खून में रिलीज़ करता है। इस तरह लिवर यह सुनिश्चित करता है, कि हमारे रक्त शर्करा का स्तर बहुत ज्यादा भी न बढ़े और बहुत कम भी न गिरे।
अगर यह संतुलन बिगड़ जाए तो डायबिटीज़, हाइपोग्लाइसीमिया जैसी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं। यही कारण है, कि लिवर को शरीर का ब्लड शुगर मैनेजर कहा जाता है, जो लगातार बैलेंस बनाए रखता है, ताकि हमें ऊर्जा की कमी महसूस न हो और शरीर ठीक से काम करता रहे।
डिटॉक्सीफिकेशन
लिवर शरीर का सबसे बड़ा डिटॉक्स सेंटर है, जो हर दिन चुपचाप कई तरह के ज़रूरी काम करता है। इनमें से दो सबसे महत्वपूर्ण काम हैं। पहला विषाक्त पदार्थों को निकालना और दूसरा एल्ब्यूमिन का निर्माण। लिवर हमारे शरीर में आने वाले टॉक्सिन्स को फ़िल्टर करता है। चाहे वो शराब हो, दवाइयाँ हों या फिर बाहर से आने वाले हानिकारक केमिकल्स, लिवर इन्हें तोड़कर सुरक्षित रूप में बदल देता है और फिर पेशाब या पित्त के जरिए बाहर निकाल देता है।
अगर यह प्रक्रिया सही से न हो पाए, तो शरीर में ज़हरीले तत्व जमा हो सकते हैं और धीरे-धीरे लिवर व दूसरे अंगों को नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसी के साथ लिवर एल्ब्यूमिन नामक एक ज़रूरी प्रोटीन भी बनाता है। एल्ब्यूमिन को आप खून का कैरियर प्रोटीन कह सकते हैं, क्योंकि यह हार्मोन, दवाइयाँ और फैटी एसिड्स को पूरे शरीर में सही जगह तक पहुँचाने का काम करता है।
पोषक तत्वों का प्रसंस्करण
जब हम खाना खाते हैं और पाचन की प्रक्रिया पूरी होती है, तो भोजन से मिले पोषक तत्व सीधे पोर्टल शिरा के ज़रिए लिवर तक पहुँचते हैं। यहाँ लिवर उनका विश्लेषण करता है और तुरंत इस्तेमाल करने वाले पोषक तत्व और बाद में इस्तेमाल करने वाले पोषक तत्व को स्टोर करने का निर्णय करता है। कार्बोहाइड्रेट्स से मिला ग्लूकोज लिवर में ग्लाइकोजन के रूप में स्टोर हो जाता है, ताकि जब शरीर को एनर्जी की जरूरत पड़े, तो इसे तुरंत इस्तेमाल किया जा सके।
प्रोटीन से मिले अमीनो एसिड्स को लिवर शरीर के ऊतक और मांसपेशियां बनाने में मदद के लिए प्रोसेस करता है। वहीं फैट्स को लिवर तोड़कर फैटी एसिड और कोलेस्ट्रॉल जैसे जरूरी अणुओं में बदलता है, जो हार्मोन और कोशिका झिल्ली बनाने के काम आते हैं। इसके साथ ही लिवर विटामिन और मिनरल्स को भी स्टोर करता है और बाद में इन्हें जरूरत पड़ने पर धीरे-धीरे रिलीज करता है, ताकि शरीर का संतुलन बना रहे।
पित्त का उत्पादन
पित्त का उत्पादन लिवर का सबसे अहम कामों में से एक है। जब भी हम फैट या तैलीय भोजन खाते हैं, तो लिवर पित्त बनाता है और इसे पित्ताशय में स्टोर कर देता है। खाने के समय यह पित्त छोटी आंत में पहुंचता है और वसा को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ देता है। इस प्रक्रिया को इमल्सिफिकेशन कहा जाता है, जिसकी वजह से फैट्स आसानी से एंजाइम्स द्वारा पचाए जा सकते हैं और फिर खून में अवशोषित होकर शरीर को ऊर्जा और ज़रूरी फैटी एसिड्स देते हैं।
अगर पित्त का उत्पादन सही मात्रा में न हो, तो वसायुक्त खाना पचाने में दिक्कत होती है और अक्सर भारीपन, अपच या मतली महसूस होती है। इसका मतलब साफ है, कि पित्त सिर्फ पाचन ही नहीं बल्कि पोषण में भी अहम भूमिका निभाता है। इसके बिना शरीर के लिए फैट-सॉल्यूबल विटामिन जैसे A, D, E और K को अवशोषित करना मुश्किल हो जाता है।
पाचन क्रिया लिवर को कैसे प्रभावित करती है ?
पाचन क्रिया के अच्छे या खराब होने का असर हमारे लिवर पर पङता है, जिसका वर्णन इस प्रकार है।
पीलिया
पीलिया लिवर की खराबी का सबसे आम और पहचानने योग्य संकेत है। जब शरीर की पुरानी लाल रक्त कोशिकाएँ टूटती हैं, तो उनसे बिलीरुबिन नाम का पीला पिगमेंट बनता है। सामान्य स्थिति में लिवर इस बिलीरुबिन को प्रोसेस करके पित्त के जरिए बाहर निकाल देता है, लेकिन अगर लिवर सही से काम न करे या पित्त का बहाव रुक जाए, तो यह बिलीरुबिन खून में जमा होने लगता है। नतीजा यह होता है, कि त्वचा, आंखों का सफेद हिस्सा और यहाँ तक कि नाखून भी पीले दिखाई देने लगते हैं। इसे ही पीलिया कहा जाता है। इसका मतलब है, कि पीलिया को हल्के में लेना खतरनाक हो सकता है। यह हमारे शरीर का अलार्म है, कि लिवर या पित्त तंत्र में कोई गंभीर गड़बड़ी है, जिसके लिए तुरंत जांच और इलाज की जरूरत होती है।
थकान और कमजोरी
लिवर में किसी भी तरह की कमी या क्षति होने पर वह विषाक्त पदार्थों को ठीक से बाहर नहीं निकाल पाता। ऐसे में आंत का वातावरण भी बिगड़ जाता है। ऐसे में भोजन से मिलने वाले पोषक तत्व पूरी तरह से स्वस्थ होने के बावजूद भी शरीर उन्हें पूरी तरह से इस्तेमाल नहीं कर पाता। नतीजा यह होता है, कि व्यक्ति को बार-बार थकान महसूस होती है, हड्डियाँ और दाँत कमजोर हो सकते हैं, रोग प्रतिरोधक क्षमता गिरने लगती है और त्वचा व बालों पर भी असर पड़ता है। इसका सीधा मतलब है, कि इससे शरीर बार-बार कमजोर महसूस करता है और खाने के बाद भी ऊर्जा नहीं मिलती।
पेट से जुडी समस्या
पेट की समस्याएँ लिवर की खराबी का बहुत आम संकेत होती हैं। जब लिवर अपनी क्षमता से काम नहीं कर पाता, तो शरीर में दो मुख्य दिक्कतें होती हैं। पहला टॉक्सिन्स जमा होने लगते हैं और दूसरा वसा का पाचन सही से नहीं हो पाता। इस वजह से व्यक्ति को बार-बार पेट फूलने, मतली आने, अपच और पेट में भारीपन या बेचैनी जैसी समस्याएँ होने लगती हैं। कई बार खाने के तुरंत बाद गैस और डकार भी महसूस होती है। अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहे, तो भूख कम लगना और वजन घटने जैसी परेशानियाँ भी सामने आ सकती हैं।
सही मायनों में पेट से जुड़ी ये परेशानियाँ केवल पाचन तंत्र की नहीं होतीं, बल्कि लिवर की कमजोरी की तरफ भी इशारा करती हैं। ऐसे में अगर ये लक्षण बार-बार दिखाई दें, तो इन्हें सिर्फ साधारण गैस या अपच समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। पेट से जुडी कोई भी समस्या लिवर में होने वाली किसी प्रकार की कमी का संकेत हो सकते हैं।
पोषक तत्वों का अधूरा अवशोषण
लिवर की कमजोरी से जुड़ी एक गंभीर समस्या पोषण तत्वों का पूरी तरह से अवशोषण न हो पाना भी है। जब लिवर सही से पित्त का उत्पादन नहीं करता, तो वसा पूरी तरह नहीं टूटती। कई जरूरी विटामिन जैसे A, D, E और K वसा में घुलनशील होते हैं, इसलिए वसा के खराब पाचन की वजह से ये विटामिन भी शरीर में सही तरह से अवशोषित नहीं हो पाते। लंबे समय तक पोषक तत्वों का कुअवशोषण होने से कुपोषण जैसी स्थिति भी पैदा हो सकती है, जबकि व्यक्ति रोजाना अच्छा खाना खा रहा हो।
अपच और पेट फूलना
अपच और पेट फूलना अक्सर इस बात का संकेत होते हैं, कि लिवर अपनी क्षमता से ठीक से काम नहीं कर पा रहा। जब लिवर कमजोर हो जाता है, तो शरीर से विषैले पदार्थ का निष्कासन रुक जाता है। अगर शरीर में विषैले पदार्थ जमा होने लगें, तो पाचन प्रक्रिया धीमी पड़ जाती है और खाने के बाद भारीपन, गैस और बेचैनी महसूस होने लगती है। इसी तरह जब लिवर पर्याप्त पित्त नहीं बना पाता, तो वसा वाले आहार ठीक से टूट नहीं पाते और परिणामस्वरूप अपच और पेट फूलने की समस्या बढ़ जाती है। लंबे समय तक यह समस्या बनी रहने पर व्यक्ति को भूख कम लगना, बार-बार डकार आना और लगातार थकान जैसी परेशानियाँ भी हो सकती हैं। अगर यह समस्या बार-बार हो रही है, तो लिवर की जाँच करवाना जरूरी है।
वसा के पाचन में कमी
अक्सर लिवर के कमजोर होने का सीधा असर वसा के पाचन पर पडता है। जब लिवर पर्याप्त मात्रा में पित्त नहीं बनाता, तो शरीर वसा को छोटे-छोटे हिस्सों में तोड़ नहीं पाता। नतीजा यह होता है, कि वसा पूरी तरह पच नहीं पाते और उनका अवशोषण भी सही से नहीं हो पाता। इस स्थिति में व्यक्ति को खाने के बाद भारीपन, पेट फूलना और बार-बार अपच जैसी समस्याएँ महसूस हो सकती हैं। कई बार मल भी तैलीय और वसायुक्त दिखने लगता है, जिसे स्टियेटोरिया कहा जाता है। लंबे समय तक लिवर द्वारा पित्त का सही उत्पादन न होने पर पोषण की कमी, हड्डियों की कमजोरी और प्रतिरक्षा प्रणाली से जुड़ी समस्याएँ भी सामने आ सकती हैं।
अन्य बीमारियाँ
चयापचय में गड़बड़ी लिवर की बीमारी का एक गंभीर नतीजा है। लिवर हमारे शरीर का मेटाबॉलिक हब है, यानी यह भोजन से मिले पोषक तत्वों को ऊर्जा में बदलने, उन्हें स्टोर करने और जरूरत पड़ने पर रिलीज करने का काम करता है। इसके बावजूद जब लिवर फैटी लिवर रोग, हेपेटाइटिस या सिरोसिस जैसी बीमारियों से प्रभावित होता है, तो उसकी यह क्षमता काफी हद तक कम हो जाती है। इस स्थिति में शरीर को ऊर्जा सही से नहीं मिल पाती।
नतीजा यह होता है, कि व्यक्ति को अक्सर थकान, कमजोरी और सुस्ती महसूस होती है। चयापचय की क्रिया में खराी होने से वजन अनियंत्रित तरीके से बढ़ या घट सकता है, ब्लड शुगर लेवल असंतुलित हो सकता है और कोलेस्ट्रॉल भी बढ़ने लगता है।

क्या लिवर की खराबी आंत के स्वास्थ्य को प्रभावित करती है ?
अस्वस्थ लिवर का असर सिर्फ लिवर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह आंतों और पूरे पाचन तंत्र को प्रभावित करता है। जब लिवर स्वस्थ होता है, तो यह भोजन से मिले पोषक तत्वों को प्रोसेस करता है, हानिकारक टॉक्सिन्स को बाहर निकालता है और पित्त बनाकर वसा के पाचन में मदद करता है। वहीं जब लिवर में गड़बड़ी शुरू होती है, उसका सीधा असर आंत के स्वास्थ्य पर दिखाई देने लगता है।
- लिवर में गङबङी होने पर सबसे पहले पाचन से जुड़ी गड़बड़ियाँ सामने आती हैं। लिवर जब टॉक्सिन्स को बाहर नहीं निकाल पाता, तो ये खून में जमा होने लगते हैं और आंतों में सूजन पैदा करते हैं। इससे अक्सर अपच, पेट दर्द और गैस जैसी समस्याएँ बढ़ जाती हैं।
- लिवर में किसी भी तरह की समस्या होने पर वसा के पाचन में भी समस्या होती है। खराब लिवर पर्याप्त मात्रा में पित्त नहीं बना पाता, जिसकी वजह से तैलीय या वसायुक्त खाना खाने के बाद पेट भारी लगना, मतली या उल्टी की समस्या आम हो जाती है।
- लिवर की कमजोरी आंत के माइक्रोबायोम पर भी असर डालती है। जब अच्छे और बुरे बैक्टीरिया का संतुलन बिगड़ जाता है, तो इसके परिणामस्वरुप दस्त, कब्ज, पेट फूलना और लगातार गैस बनने जैसी दिक्कतें होने लगती हैं।
- लिवर के प्रभावित होने पर कई मामलों में लीकी गट सिंड्रोम भी विकसित हो सकता है। जब लिवर आंत की परत को सही तरीके से सपोर्ट नहीं कर पाता, तो आंत की दीवार कमजोर होकर टॉक्सिन्स और बैक्टीरिया को खून में जाने देती है। इसका नतीजा पूरे शरीर में सूजन और बार-बार पाचन संबंधी बीमारियों के रूप में निकलता है।
- लिवर पाचन एंजाइमों को नियंत्रित करने में भी मदद करता है। जब यह सही से काम न करे तो एंजाइम की कमी हो जाती है और शरीर भोजन से पोषण को ठीक से अवशोषित नहीं कर पाता। नतीजा यह कि थकान, कमजोरी और लगातार पाचन की समस्याएँ बनी रहती हैं।