Liver Transplant: When It’s Needed and What to Expect In Hindi : लिवर प्रत्यारोपण: इसकी आवश्यकता कब होती है और क्या अपेक्षा करें ?

Liver Transplant: When It’s Needed and What to Expect In Hindi : लिवर हमारे शरीर का एक अद्वितीय अंग है, क्योंकि इसमें पुनर्जीवित होने की क्षमता होती है। अगर किसी कारण से इसका कोई हिस्सा क्षतिग्रस्त हो जाए या प्रत्यारोपण किया जाए, तो यह कुछ महीनों के भीतर सामान्य आकार तक बढ़ सकता है। आमतौर पर प्रत्यारोपण के लिए लिवर उन दाताओं से लिया जाता है, जिनका निधन हो चुका होता है और जो पंजीकृत अंग दाता होते हैं। ये बात सच है, कि लिवर की यही विशेष क्षमता इसे जीवित दान के लिए भी उपयुक्त बनाती है।

इसकी एक और खास बात ये भी है, कि एक स्वस्थ व्यक्ति अपने लिवर का एक हिस्सा दान कर सकता है और वह हिस्सा धीरे-धीरे दाता और प्राप्तकर्ता दोनों के शरीर में पुनः बढ़कर कार्य करने लगता है। अगर हम कहें, कि लिवर प्रत्यारोपण एक व्यक्ति को नया जीवन दान देता है, तो इस बात में कोई शक नहीं होगा। ऐसे में इससे जुङी सभी बातों के बारे में जानना और समझना और भी आवश्यक हो जाता है। आज इस आर्टिकल में हम लिवर प्रत्यारोपण से जुडी सभी बातों के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे।

A human liver between two palms of a woman on blue and green background. The concept of a healthy liver.

क्या है लिवर प्रत्यारोपण ?

लिवर प्रत्यारोपण सर्जरी एक जटिल प्रक्रिया है। इस ऑपरेशन के दौरान सर्जन रोगग्रस्त या घायल लीवर को पूरी तरह हटा कर इसे दाता के लिवर से बदल देते हैं। ऑपरेशन के दौरान और उसके बाद कुछ दिनों तक शरीर के विभिन्न कार्यों में सहायता के लिए कई ट्यूब और उपकरण लगाए जाते हैं, जिनमें श्वास नली, तरल पदार्थ और दवाओं के लिए अंतःशिरा लाइनें, मूत्र संग्रह के लिए कैथेटर और पेट से तरल पदार्थ और रक्त निकालने के लिए अन्य नलिकाएं शामिल हैं।

ऑपरेशन के तुरंत बाद मरीज कुछ दिनों के लिए गहन चिकित्सा इकाई (ICU) में रहते हैं और फिर स्थिति स्थिर होने पर नियमित अस्पताल के कमरे में स्थानांतरित किए जाते हैं। अस्पताल में भर्ती रहने की अवधि व्यक्तिगत परिस्थितियों और किसी भी जटिलताओं के आधार पर भिन्न हो सकती है। कुल मिलाकर लिवर प्रत्यारोपण एक ऐसी सर्जरी है, जो विशेषज्ञों की निगरानी में की जाती है और पूरी तरह से सुरक्षित होती है।

लिवर प्रत्यारोपण के प्रकार

लिवर प्रत्यारोपण दो प्रकार का होता है।

  1. मृत दाता (डेडोनर)

इस प्रकार के लिवर प्रत्यारोपण में ऐसे व्यक्ति का लिवर दान लिया जाता है, जिसकी हाल ही में मृत्यु हुई हो। मृत दाता से प्राप्त लिवर को उपयुक्त आकार और स्थिति में प्रत्यारोपित करके मरीज को लगाया जाता है। यह विकल्प विशेष रूप से उन मरीजों के लिए उपयोगी होता है जिनके पास जीवित डोनर उपलब्ध नहीं है।

2. जीवित दाता (लिविंग डोनर)

इसमें मरीज का परिवार का कोई सदस्य या अन्य स्वस्थ व्यक्ति अपने लिवर का एक हिस्सा दान करता है। इस स्थिति में लिवर में पुनर्योजी (Regenerative) क्षमता होती है, दान किए गए हिस्से से प्राप्त लीवर धीरे-धीरे बढ़कर पूरी कार्यक्षमता प्राप्त कर लेता है और दाता का लिवर भी पुनर्जीवित होकर सामान्य आकार और कार्य में लौट आता है।

लिवर प्रत्यारोपण क्यों जरुरी है ?

लिवर प्रत्यारोपण की आवश्यकता तब पड़ती है, जब लिवर इतनी क्षति झेल चुका होता है, कि वह शरीर को जीवित रखने के लिए पर्याप्त रूप से कार्य नहीं कर पाता। यह प्रक्रिया लीवर फेलियर वाले मरीजों के लिए जीवनरक्षक साबित होती है। आज के समय में लिवर प्रत्यारोपण की सफलता दर लगभग 85–90% के बीच है, जिससे यह गंभीर लिवर रोगों का एक प्रभावी उपचार विकल्प बन गया है। लिवर प्रत्यारोपण तकनीकी रूप से जटिल सर्जरी है, जिसके लिए सर्जन को विशेष प्रशिक्षण और अनुभव की आवश्यकता होती है। ऑपरेशन से पहले मरीज की कई प्रकार की जांचें की जाती हैं और उनकी फिटनेस का मूल्यांकन किया जाता है।

सर्जरी के दौरान मरीज का खराब या रोगग्रस्त लिवर निकालकर नया लिवर प्रत्यारोपित किया जाता है, जो आम तौर पर किसी डोनर से लिया जाता है। ज्यादातर मामलों में डोनर मरीज के करीबी रिश्तेदार होते हैं। कई मामलों में मृत शरीर से भी लिवर प्राप्त किया जा सकता है, लेकिन वर्तमान में हमारे देश में मृत्यु के बाद अंगदान करने वाले मामलों की संख्या अभी भी बहुत कम है। जब हमारा लिवर पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो जाता है, तब लिवर प्रत्यारोपण ही एकमात्र विकल्प बचता है, जो व्यक्ति को एक नया जीवनदान देता है।

किन परिस्थितियों में लिवर प्रत्यारोपण की जरुरत पडती है ?

लिवर प्रत्यारोपण तब किया जाता है, जब लिवर पूरी तरह अपना दम तोङ चुका हो। इसके लिए आवश्यक है, उन परिस्थितियों के बारे में पता होना, जिसमें लिवर प्रत्यारोपण ही एकमात्र विकल्प होता है।

  • पित्त नलिकाओं के रोग – पित्त नलिकाओं के रोग यकृत को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकते हैं। पित्त नलिकाएं वे नलिकाएं होती हैं, जो यकृत में बनने वाले पाचक तरल पित्त को छोटी आंत तक पहुंचाने का कार्य करती हैं। इनसे संबंधित बीमारियों में प्राथमिक पित्तवाहिनीशोथ, प्राथमिक स्क्लेरोजिंग पित्तवाहिनीशोथ और पित्त गतिभंग शामिल हैं। विशेष रूप से पित्त गतिभंग, जिसमें पित्त नलिकाएं अनुपस्थित या विकृत होती हैं, आमतौर पर जन्म के तुरंत बाद पहचान में आ जाती है। यह स्थिति बच्चों में लिवर की विफलता और लिवर प्रत्यारोपण का सबसे आम कारण मानी जाती है।
  • आनुवांशिक स्थितियाँ – कुछ आनुवंशिक स्थितियाँ भी लिवर को प्रभावित कर सकती हैं। उदाहरण के लिए, विल्सन रोग में लिवर में तांबे का खतरनाक स्तर जमा हो जाता है, जबकि हेमोक्रोमैटोसिस में आयरन का अत्यधिक संचय होता है। दोनों ही स्थितियाँ समय रहते उपचार न मिलने पर लिवर को गंभीर नुकसान पहुँचा सकती हैं और अंत में लिवर प्रत्यारोपण के अलावा और कोई उपचार नहीं बचता।
  • गंभीर फैटी लिवर – मेटाबोलिक डिसफंक्शन एसोसिएटेड स्टेटोटिक लिवर डिजीज (MASH) एक गंभीर यकृत संबंधी स्थिति है, जिसमें लिवर में वसा का अत्यधिक जमाव हो जाता है। यह जमाव आगे चलकर सूजन पैदा करता है और लिवर की कोशिकाओं को नुकसान पहुँचाता है। इस बीमारी को पहले नॉन-अल्कोहलिक स्टेटोहेपेटाइटिस (NASH) के नाम से जाना जाता था। इस स्थिति में जब लिवर पूरी तरह से वसा से युक्त हो जाता है, तो सिवाय लिवर प्रत्यारोपण के और कोई उपचार का तरीका नहीं होता।
  • लिवर फेलियर – लिवर फेलियर दो प्रकार का हो सकता है। तीव्र (Acute) और दीर्घकालिक (Chronic)।

तीव्र लिवर फेलियर अचानक हो सकता है, जैसे संक्रमण, ज़हरीले पदार्थों या कुछ दवाओं से होने वाली जटिलताओं के कारण।

क्रोनिक लिवर फेलियर लंबे समय में विकसित होता है। यह महीनों, वर्षों या दशकों तक धीरे-धीरे बढ़ता है। इसका प्रमुख कारण सिरोसिस है, जिसमें स्वस्थ लिवर ऊतक की जगह निशान ऊतक ले लेता है, जिससे लिवर अपने सामान्य कार्यों को करने में असमर्थ हो जाता है।

क्या लिवर प्रत्यारोपण पूरी तरह सुरक्षित और सफल होता है ?

आज की तारीख में लिवर प्रत्यारोपण मेडिकल साइंस की सबसे सफल सर्जरी में से एक मानी जाती है। आंकड़ों के मुताबिक इसकी सफलता दर 90% से भी ज्यादा है, यानी ज्यादातर मरीज ऑपरेशन के बाद सामान्य जीवन जी सकते हैं। इसके साथ ही ये बात भी सच है, कि हर केस एक जैसा नहीं होता। ये जरुरी नहीं होता, कि हमेशा लिवर प्रत्यारोपण सफल ही हो। कुछ प्रतिशत मरीज ऐसे भी होते हैं, जिनका शरीर नए लिवर को स्वीकार नहीं कर पाता या फिर उन्हें अन्य गंभीर जटिलताओं का सामना करना पड़ता है।

अगर लंबे समय तक जीवित रहने की बात करें, तो लिवर प्रत्यारोपण के बाद 1 साल की सर्वाइवल दर लगभग 89% तक होती है। वहीं 5 साल तक यह आंकड़ा करीब 75% तक रह जाता है। इसका मतलब यह है, कि ज्यादातर मरीज सफलतापूर्वक नया जीवन जी पाते हैं, लेकिन कुछ मरीजों के लिए यह सफर चुनौतीपूर्ण भी हो सकता है। लिवर प्रत्यारोपण की सफलता कई फैक्टर्स पर निर्भर करती है। सबसे पहले तो मरीज की स्वास्थ्य स्थिति और उसकी मूल बीमारी अहम भूमिका निभाती है।

अगर लिवर किसी गंभीर कैंसर या एडवांस सिरोसिस की वजह से डैमेज हुआ है, तो सफलता दर थोड़ी प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा डोनर लिवर की गुणवत्ता और मैचिंग भी काफी मायने रखती है। इसके साथ ही लिवर प्रत्यारोपण के बाद मरीज को जीवनभर दवाएं लेनी होती हैं, ताकि शरीर नया लिवर अस्वीकार न करे। इतना ही नहीं निरंतर रुप से नियमों का पालन करना होता है और इसके साथ ही नियमित स्वास्थ्य जाँच भी बेहद जरूरी होती हैं, क्योंकि इससे डॉक्टर समय रहते किसी भी समस्या को पकड़कर उसका इलाज कर सकते हैं।

लिवर प्रत्यारोपण की सफलता दर

अक्सर लोग लिवर प्रत्यारोपण की सफलता के बारे में जानने के लिए इच्छुक रहते हैं। ऐसे में उनके मन में इससे जुङे कई तरह के सवाल भी उठते हैं। अच्छी खबर यह है, कि मेडिकल साइंस की तरक्की के चलते इसकी सफलता दर लगातार बेहतर हो रही है और आज यह दुनिया की सबसे सफल सर्जरी में गिनी जाती है। सामान्य तौर पर लिवर प्रत्यारोपण की सफलता दर 90% से भी ज्यादा बताई जाती है। इसका मतलब है, कि हर 10 में से लगभग 9 मरीज ऑपरेशन के बाद सुरक्षित रहते हैं और रिकवरी कर पाते हैं।

अगर हम एक साल की सर्वाइवल रेट देखें तो आंकड़े बताते हैं, कि लिवर प्रत्यारोपण के बाद 89% मरीज एक साल तक स्वस्थ रहते हैं। वहीं पांच साल बाद भी करीब 75% मरीज अच्छे से जीवन जीते रहते हैं। ये आंकड़े साबित करते हैं, कि लिवर प्रत्यारोपण केवल जीवन बचाने वाली सर्जरी नहीं है, बल्कि यह मरीज को एक नई उम्मीद और लंबी उम्र भी देता है।

Leave a Comment