Malaria Vaccine Approved: Everything You Must Know Before You Travel In Hindi : हम सभी जानते हैं, कि मलेरिया बेहद खतरनाक संक्रामक बीमारी है, जिससे हर साल लाखों लोगों की जान जाती है। अफ्रीकी देशों में बच्चे इस बीमारी का सबसे बड़ा शिकार बनते हैं। कोरोना वायरस की त्रासदी से पहले भी मलेरिया दुनियाभर में हर साल लगभग चार लाख मौतों का कारण बनता था। दशकों से वैज्ञानिक मलेरिया की वैक्सीन बनाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन परजीवी (parasite) की जटिल संरचना इस राह में सबसे बड़ी चुनौती रही।
ऐसे में अच्छी खबर ये है, कि आखिरकार विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने मलेरिया की पहली वैक्सीन मॉस्किरिक्स (Mosquirix) के इस्तेमाल को मंजूरी दे दी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन प्रमुख टेड्रोस एडनॉम ने इसे मलेरिया के खिलाफ लड़ाई में ऐतिहासिक दिन बताया है। इस आर्टिकल में हम मलेरिया की पहली वैक्सीन के बारे में विस्तार से चर्चा करने वाले हैं।

मलेरिया कैसे फैलता है ?
मलेरिया प्लाजमोडियम फाल्सीपेरम (Plasmodium falciparum) नामक परजीवी से फैलता है। यह एनाफिलीज (Anopheles) मच्छर के काटने से इंसान के शरीर में प्रवेश करता है। मादा मच्छर जब इंसान को काटती है, तो वह परजीवी केअणु कोशिकाओं (sporozoite) को खून में छोड़ देती है। ये कोशिकाएँ लिवर में जाकर बढ़ती हैं और मेरोजोइट्स (merozoite) में बदल जाती हैं, जो आगे चलकर लाल रक्त कोशिकाओं (RBCs) पर हमला करती हैं और संख्या बढ़ाती जाती हैं।
संक्रमण के बाद मरीज को तेज बुखार, ठंड लगना, सिरदर्द, मांसपेशियों में दर्द और कई बार एनीमिया जैसी गंभीर समस्याएँ हो जाती हैं। इसके अलावा परजीवी खून में गैमटोसाइट (gametocyte) जिसे युग्मकोशिका कहा जाता है, वह भी छोड़ता है। जब दूसरा मच्छर संक्रमित इंसान को काटता है, तो ये परजीवी उस मच्छर में पहुँचकर फिर से फैलने लगते हैं। इस तरह एक मच्छर स्वस्थ व्यक्ति को संक्रमित करता है।
इस परजीवी का जीवनचक्र बेहद जटिल है और इसकी सतह पर मौजूद प्रोटीन बार-बार बदलते रहते हैं। यही वजह है, कि इम्यून सिस्टम इसे आसानी से पहचान नहीं पाता। सामान्य वैक्सीन किसी स्थिर प्रोटीन को निशाना बनाती है, लेकिन मलेरिया परजीवी के प्रोटीन लगातार बदलते रहते हैं। परजीवी के प्रोटीन के नियमित रुप से बदलने के कारण ही 80 साल से इस बीमारी की वैक्सीन बनाने की कोशिशें बार-बार असफल होती रहीं है।
मॉस्किरिक्स वैक्सीन क्यों खास है ?
कई दशकों की कोशिशों के बाद मॉस्किरिक्स नामक मलेरिया की वैक्सीन ने इस चुनौती को पार किया है। यह परजीवी की अणु कोशिकाओं पर हमला करती है। इस वैक्सीन में वही प्रोटीन शामिल है, जो परजीवी इस शुरुआती अवस्था में प्रदर्शित करता है। जब वैक्सीन शरीर में दी जाती है, तो इम्यून सिस्टम इस प्रोटीन को पहचानकर संक्रमण से लड़ने की क्षमता विकसित करता है। यही कारण है, कि ये वैक्सीन मलेरिया के संक्रमण पर सीधे तौर पर असर करती है।
बात अगर इस वैक्सीन की शुरुआत की करें, तो शायद ही आपको पता होगा, कि इसे सबसे पहले1980 के दशक में बेल्जियम की स्मिथक्लीन-रिट (SmithKline-RI टीम ने तैयार किया था, जो अब ग्लैक्सोस्मिथक्लीन (GSK) का हिस्सा है। कई सालों तक यह वैक्सीन सफल नहीं हो पाई, लेकिन सालों तक और बार-बार जब इस पर परीक्षण किए गए, तब जाकर ये उम्मीदों पर खरी उतरी और मलेरिया जैसी खतरनाक बीमारी से लडने की आशा पैदा हुई।
परीक्षण और चुनौतियाँ
मलेरिया सदियों से मानवता का सबसे बड़ा दुश्मन रहा है। अब आखिरकार मॉस्किरिक्स जैसी वैक्सीन से पहली बार उम्मीद की किरण जगी है। भारत की एडफाल्सीवैक्स और अन्य नई वैक्सीनें भी इस लड़ाई को आगे बढ़ा रही हैं। हालांकि वैक्सीन अकेले इस समस्या का समाधान नहीं हैं। जागरूकता, साफ-सफाई और मच्छर नियंत्रण के उपाय भी उतने ही आवश्यक हैं। 2004 में The Lancet में प्रकाशित पहले बड़े परीक्षण में पाया गया, कि 1-4 साल के 2000 बच्चों को जब यह वैक्सीन दी गई, तो छह महीने बाद संक्रमण का खतरा 57% कम हो गया। लेकिन आगे चलकर डेटा उतना उत्साहजनक नहीं रहा।
इसके बाद 2009 से 2011 के बीच सात अफ्रीकी देशों में इसका परीक्षण किया गया। इसमें 6-12 हफ्ते के बच्चों पर वैक्सीन कारगर नहीं दिखी। हालांकि 17-25 महीने की उम्र के बच्चों में यह 40% तक संक्रमण और 30% तक गंभीर संक्रमण को कम करने में सक्षम रही। इसके बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 2019 में घाना, केन्या और मलावी में एक पायलट प्रोग्राम शुरू किया। इसमें 8 लाख से ज्यादा बच्चों को वैक्सीन दी गई। नतीजों में पाया गया, कि 23 लाख से ज्यादा खुराकें देने के बाद मलेरिया के गंभीर मामलों में 30% की कमी आई।
मलेरिया वैक्सीन के परीक्षण की एक सबसे अहम बात यह रही, कि वैक्सीन का बच्चों के दूसरे टीकाकरण कार्यक्रमों या अन्य बीमारियों पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ा। यही कारण था, कि इसके अधूरे परिणाम के बावजूद भी विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा इसे मंजूरी मिली। इस वैक्सीन की मंजूरी की खास वजह यही थी, कि इसके नुकसान या किसी भी तरह के साइड इफेक्ट के डर से वे पूरी तरह से बेफिक्र थे।

विश्व स्वास्थ्य संगठन से मिली मंजूरी
मलेरिया की मॉस्किरिक्स वैक्सीन के द्वारा सभी चुनौतियों को पार करने के बावजूद भी इसे संक्रमित व्यक्तियों पर इस्तेमाल करना इतना भी सरल नहीं था। इसके उपयोग की इस दीवार को अक्टूबर 2021 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने मंजूरी देकर तोड दिया। फिलहाल यह वैक्सीन अफ्रीकी देशों में बच्चों के लिए उपलब्ध कराई जा रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है, कि यह केवल एक वैक्सीन नहीं बल्कि मलेरिया से लड़ाई में एक ऐतिहासिक हथियार है।
इसके साथ ही ये बात भी सच है, कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने खासतौर पर ये चेतावनी दी है, कि मलेरिया से पूरी तरह बचाव के लिए केवल वैक्सीन पर भरोसा नहीं किया जा सकता। इससे बचने के लिए मच्छरदानी, कीटनाशक और समय पर इलाज अब भी जरूरी रहेंगे। विश्व स्वास्थ्य संगठन के कथन के अनुसार अगर हम छोटी-छोटी आदतों को अपनाते हैं, तो हम वैक्सीन के साथ या उसके बिना भी मलेरिया के परजीवी से अपनी रक्षा खुद कर सकते हैं।
भारत में मलेरिया वैक्सीन
भारत मलेरिया से सबसे प्रभावित देशों में से एक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 2017 में मलेरिया के आधे मामले नाइजीरिया, कॉन्गो, मोजाम्बिक, भारत और युगांडा में पाए गए। भारत ने भी मलेरिया वैक्सीन के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि हासिल की है। देश की पहली स्वदेशी वैक्सीन एडफाल्सीवैक्स (AdFalciVax) विकसित की गई है। इसकी सबसे बडी खास बात ये है, कि इसका भंडारण करना बेहद आसान होता है। इसे कमरे के तापमान पर रखा जा सकता है, जिससे यह दूर-दराज इलाकों तक आसानी से पहुँच सकती है।
इतना ही नहीं यह वैक्सीन परजीवी के लिवर और मच्छर चरण को लक्ष्य करती है। यही कारण है,कि ये लाखों भारतीयों की जान बचाने की क्षमता रखती है। इसके अलावा अन्य वैक्सीन जैसे R21/Matrix-M भी विकसित की गई हैं, जो गंभीर मलेरिया को कम करने में मदद कर सकती हैं। कुल मिलाकर हम कह सकते हैं, कि अगर भारत में मलेरिया संक्रमण का प्रभाव अन्य देशों की तुलना में अधिक पाया जाता है, तो भारत देश इस दिशा में इस प्रभाव को कम करने के लिए लगातार काम कर रहा है, जिसके परिणाम भी देखने को मिल रहे हैं।
वैक्सीन का आगमन मलेरिया के खिलाफ जंग में क्रांतिकारी कदम है, लेकिन यह अभी अंतिम समाधान नहीं है। WHO के आंकड़ों के अनुसार 2017 में दुनियाभर में 4.35 लाख लोग मलेरिया से मरे। इनमें से 92% मामले अफ्रीका के सब-सहारा क्षेत्र में पाए गए। विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानना है, कि मलेरिया से लड़ाई के लिए बहुस्तरीय रणनीति जरूरी है। वैक्सीन, मच्छर-रोधी उपाय, समय पर निदान और इलाज ये सभी मिलकर ही इस बीमारी को जड से खत्म कर सकते हैं।

मलेरिया से बचाव के लिए यात्रा से पहले की तैयारी
मलेरिया यात्रा के दौरान फैलनी वाली प्रमुख संक्रामक बीमारीयों में से एक है। ऐसे में यात्रा पर जाने से पहले कुछ खास चीजों का ध्यान रखना आवश्यक है, ताकि मलेरिया के संक्रमण से बचा जा सकें।
बैग में जरुरी सामान रखना न भूलें
यात्रा पर निकलने से पहले केवल बैग पैक करना ही काफी नहीं है, बल्कि अपनी सेहत का ध्यान रखना भी उतना ही जरूरी है। खासकर अगर आप ऐसे क्षेत्र की यात्रा कर रहे हैं, जहां मलेरिया का खतरा अधिक है। ऐसे में बैग में उन सभी जरुरी चीजों को रखना न भूलें, जो आपको मच्छर या मलेरिया के संक्रमण से बचाने में मदद करें। यात्रा का आनंद तभी संभव है जब आप स्वस्थ रहें। ऐसे में जरुरी है, कि समय रहते सही तैयारी करें, दवाएं और सुरक्षा उपाय अपनाएं।
डॉक्टर से अपनी यात्रा योजना साझा करें
यात्रा पर जाने से पहले सबसे पहले अपने डॉक्टर से मिलें और अपनी यात्रा योजनाओं के बारे में उनसे परामर्श लें। डॉक्टर को अपने डेस्टिनेशन और सफर के बारे में बताएं। इससे लाभ होगा, कि वे आपकी सेहत और यात्रा क्षेत्र को ध्यान में रखकर आपको उचित सलाह देंगे। कई बार आप जिस इलाके में जा रहे हैं, वहां मलेरिया के मामलों की स्थिति और आंकडो के बारे में जानना जरुरी होता है।
दवाओं का विकल्प अपनाएं
अगर खतरा ज्यादा है, तो डॉक्टर आपको एंटी-मलेरियल दवाओं के बारे में बता सकते हैं। यह दवाएं संक्रमण से बचाव में मदद करती हैं, लेकिन इन्हें लेने का समय और खुराक बहुत महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में यात्रा से पहले ही योजना बनाना जरूरी है। इसके अलावा कुछ मामलों में मलेरिया वैक्सीन या अन्य टीकाकरण की भी सलाह दी जा सकती है।